स्थिति, श्राप नहीं
दोष कुंडली की बस एक स्थिति है, जिसके बारे में पुरानी किताबों ने कहा कि इस पर ध्यान रखिए। इसका मतलब है "सँभलकर चलिए"। इसका मतलब "सब ख़त्म" नहीं है। आम नियम के हिसाब से हर तीन में से करीब एक कुंडली में मंगल दोष निकल आता है। अगर यह सचमुच कोई आफ़त होती, तो दुनिया की एक तिहाई आबादी आफ़त में जी रही होती।
परंपरा भी यही कहती है। लगभग हर दोष के साथ उसके रद्द होने (भंग) और हल्का पड़ने के कई तरीक़ों की लंबी सूची भी दी गई है। पर मशहूर क़िस्सों में यही सूची छूट जाती है।
मंगल दोष
यह तब बनता है जब मंगल लग्न या चंद्रमा से पहले, दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव में बैठा हो। इसे रिश्तों में गर्मी की निशानी माना जाता है - तेज़ भावनाएँ, टकराव और मज़बूत इरादा।
कई बातें इसे रद्द कर देती हैं या हल्का कर देती हैं। मंगल अपनी ही राशि में हो। दोनों साथियों की कुंडली में यह हो। कई परंपराओं में एक उम्र के बाद यह अपने आप हल्का पड़ जाता है। ऐसी और भी कई स्थितियाँ हैं। सब कुछ संदर्भ पर टिका है।
काल सर्प दोष
कहा जाता है कि यह तब बनता है जब सातों शास्त्रीय ग्रह राहु और केतु के बीच आ जाएँ। इसे ऐसा जीवन माना जाता है जिसमें कर्म के विषय भारी रहते हैं - कड़े अध्याय, और ऐसे फल जो देर से आते हैं पर सच्चे होते हैं।
एक बात जान लीजिए: सबसे पुराने ग्रंथ इसका ज़िक्र तक नहीं करते। यह बाद का विचार है। कई नामी ज्योतिषी इसे कम मानते हैं, या बिलकुल नहीं मानते।
दोष को कैसे लें
अगर कोई कहे कि आपकी कुंडली में दोष है, तो उस शब्द से ज़्यादा तीन सवाल मायने रखते हैं। क्या यह सख़्त नियम के हिसाब से सचमुच बना भी है? क्या कुंडली में कहीं और यह रद्द या हल्का हो रहा है? और यह रोज़मर्रा में आपसे क्या माँगता है - साथी के साथ धीरज, ग़ुस्से में सावधानी, समय का लिहाज़?
जो कोई डर दिखाकर बात शुरू करे, या दोष हटाने की क़ीमत बताए, वह ज्योतिष नहीं कर रहा। दोष का पुराना जवाब यही है: पहले जानिए, फिर कुछ कीजिए। और उपाय हमेशा से हल्के-फुल्के ही माने गए हैं।